मुग़ल सेना दोड्डेरी के कच्चे दुर्ग में घिर गई; क़ासिम ख़ाँ वहीं मरा और शेष ने आत्मसमर्पण कर फिरौती दी।
01संभाजी के बाद का युद्ध
1689 में छत्रपति संभाजी की हत्या के बाद उनके भाई राजाराम सुदूर दक्षिण में जिंजी पहुँचे, और मराठा युद्ध घूमते घुड़सवार सेनापतियों के हाथ आ गया। उनमें सबसे बड़े थे संताजी घोरपडे और धनाजी जाधव। संताजी तेज़ी से चलते, अनपेक्षित स्थान पर प्रहार करते और रास्ते की भूमि से ही रसद लेते। 1695 में वे कर्नाटक के पठार में उतरे, जहाँ सिरा का मुग़ल सेनापति क़ासिम ख़ाँ बड़ी सेना और रसद-काफ़िले के साथ बढ़ रहा था, और शाही छावनी से भेजी सेना लेकर ख़ानाज़ाद ख़ाँ भी उससे आ मिला था।
02दोड्डेरी में बंद
संताजी ने भोर में मुग़ल शिविर पर धावा बोला, सामान छीन लिया और सेना को रसद से काट दिया। मुग़लों ने दोड्डेरी के कच्चे दुर्ग में शरण ली, जहाँ अनाज लगभग नहीं था। संताजी के घुड़सवारों ने उसे घेर लिया। मुग़ल इतिहासों के आधार पर जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि सैनिक अपने घोड़े खाने लगे और भूख से मरने लगे। क़ासिम ख़ाँ भीतर ही मरा, फ़ारसी वृत्तांतों के अनुसार अफ़ीम की अधिक मात्रा से। ख़ानाज़ाद ख़ाँ ने आत्मसमर्पण किया, भारी फिरौती दी और सेना के घोड़े-हाथी सौंप दिए। कुछ सप्ताह बाद, जनवरी 1696 में, संताजी ने बसवपट्टण में हिम्मत ख़ाँ की सहायक सेना को नष्ट किया, जहाँ हिम्मत ख़ाँ मारा गया।
दोड्डेरी ने सिद्ध किया कि महाराष्ट्र में राजधानी और राजा के बिना भी मराठे खुले मैदान में शाही सेनाएँ नष्ट कर सकते थे, और इससे हर मुग़ल छावनी में संताजी के नाम का भय फैल गया।
