अफ़ग़ानों ने नदी पार की और मराठा सेना टूट गई; दत्ताजी शिंदे मारे गए।
01शुक्रताल और अफ़ग़ानों की वापसी
1758 में मराठों ने अब्दाली के सूबेदारों को पंजाब से निकाल दिया था। जयाप्पा के भाई और युवा जनकोजी के चाचा दत्ताजी शिंदे को हिंदुस्तान सँभालने उत्तर भेजा गया। 1759 की पूरी शरद ऋतु वे गंगा किनारे शुक्रताल में रुहेला सरदार नजीबुद्दौला को घेरे रहे, और नजीब सहायता के लिए अब्दाली को पत्र लिखता रहा। वर्ष के अंत में अब्दाली पंजाब से नीचे उतरा। दत्ताजी ने घेरा छोड़ा और दिल्ली की रक्षा को पीछे हटे, और उनकी सेना ने नगर के उत्तर में यमुना के घाटों पर, बरारी घाट पर, मोर्चा लिया।
02घाट पर मृत्यु
जनवरी 1760 में अफ़ग़ान और रुहेला सैनिक ऊँचे सरकंडों में छिपकर नदी के एक टापू पर उतरे और मराठा चौकियों पर टूट पड़े। दत्ताजी उन्हें खदेड़ने आगे बढ़े और गोली खाकर गिर पड़े; जनकोजी घायल हुए और उनके सैनिक उन्हें उठा ले गए। जदुनाथ सरकार इसके बाद की भगदड़ का वर्णन करते हैं। मराठा परंपरा दत्ताजी का वह उत्तर याद रखती है जो उन्होंने मरते समय शत्रु के पूछने पर दिया कि क्या वे फिर लड़ेंगे: ‘बचेंगे तो और भी लड़ेंगे।’ उनका सिर काटकर अफ़ग़ान शिविर ले जाया गया। ऐसा करने वाला रुहेला क़ुतुब शाह उसी वर्ष अक्टूबर में मराठों द्वारा कुंजपुरा जीतने पर पकड़ा गया और मारा गया।
बरारी घाट में मराठों ने उत्तर का अपना सेनापति खोया, और पेशवा की मुख्य सेना के साथ सदाशिवराव भाऊ दक्कन से उत्तर आए; एक वर्ष बाद पानीपत की भूमिका यहीं बनी।
