खुले मैदान की लड़ाई में अहोमों की भारी जनहानि के साथ हार हुई।
01पहाड़ छोड़ने की भूल
लाचित की योजना थी कि गुवाहाटी के आसपास की पहाड़ियाँ और नदी-रेखा थामे रहें और मुग़लों को अपनी ओर आने दें। आलाबोई में यह योजना छोड़ दी गई। बुरंजियाँ लिखती हैं कि अहोम सेना खुले में लड़ने उतरी, जहाँ रामसिंह की राजपूत और मुग़ल घुड़सवार सेना का हर तरह से पलड़ा भारी था। अहोमों के हज़ारों सैनिक मारे गए, और इतिहासकार इसे युद्ध का सबसे रक्तरंजित दिन गिनते हैं।
02सीखा गया सबक़
आलाबोई के बाद भी गुवाहाटी मुग़लों के हाथ नहीं आया। अहोम फिर अपने मिट्टी के गढ़ों, नदी के बेड़े और धीरज की लड़ाई पर लौट आए, और रामसिंह डेढ़ वर्ष तक पहाड़ियों के नीचे अटका रहा। 1671 में निर्णायक लड़ाई सराईघाट में हुई, पानी पर, जहाँ अहोम सबसे सबल थे।

एक महँगी हार, जिसने लाचित की ही रीति को सही सिद्ध किया: पहाड़ और नदी से लड़ो, मैदान में नहीं।

