आज भी खड़ा

तुळजा भवानी मंदिर, तुळजापुर

भोसले घराने और महाराष्ट्र के बड़े भाग की कुलदेवी, बालाघाट पहाड़ियों की एक घाटी में धँसे मंदिर में। छत्रपति शिवाजी अपने अभियानों से पहले उनकी पूजा करते थे।

निर्माण: मध्यकालीन मंदिर, मराठा काल में विस्तृतस्थान: महाराष्ट्रदेवता: माता तुळजा भवानी, दुर्गा का रूप18.01° N, 76.07° E
  1. 1659
  2. 10 नवंबर 1659
चित्र: Kiran891 · CC BY-SA 4.0

01शिवाजी की आराध्य माता

तुळजा भवानी काले पत्थर में अष्टभुजा रूप में, महिषासुर का वध करती हुई खड़ी हैं। कोल्हापुर, माहूर और वणी के साथ उन्हें महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में गिना जाता है। भोसलों के लिए वे कुलदेवी थीं, और जिजाबाई ने अपने पुत्र को इसी भक्ति में पाला। मराठा परंपरा कहती है कि स्वयं भवानी ने शिवाजी को तलवार दी, और उन्होंने अपनी प्रिय तलवार का नाम उन्हीं पर रखा। यात्री राजे शहाजी महाद्वार से प्रवेश कर सीढ़ियाँ उतरकर आँगन में जाते हैं, क्योंकि मंदिर नगर के स्तर से नीचे है।

02अफ़ज़ल ख़ान का अभियान, 1659

1659 में बीजापुर का सेनापति अफ़ज़ल ख़ान शिवाजी के विरुद्ध चला। कृष्णाजी अनंत सभासद की मराठा बखर लिखती है कि रास्ते में उसकी सेना ने तुळजापुर में भवानी के मंदिर को अपवित्र किया और फिर पंढरपुर की ओर गई, ताकि शिवाजी को पहाड़ों से बाहर निकलने को उकसाया जा सके। शिवाजी नीचे नहीं आए। वे प्रतापगढ़ पर प्रतीक्षा करते रहे, और उसी वर्ष नवंबर में अफ़ज़ल ख़ान उसकी तलहटी में मारा गया। मंदिर में फिर पूजा आरंभ हुई, और मराठा सरदारों तथा बाद के शासकों ने इसे दान दिए; आश्विन की नवरात्रि यहाँ का सबसे बड़ा उत्सव है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 1659शिवाजी के विरुद्ध अभियान में अफ़ज़ल ख़ान की सेना ने मंदिर को अपवित्र किया (सभासद बखर)।
  2. 10 नवंबर 1659प्रतापगढ़ पर अफ़ज़ल ख़ान मारा गया; मराठा संरक्षण में तुळजापुर की पूजा चलती रही।
दर्शन और यात्रा

सोलापुर से लगभग 45 किमी। नवरात्रि और आश्विन पूर्णिमा (कोजागिरी) पर सबसे अधिक भीड़ होती है; बहुत से लोग सोलापुर और आगे से पैदल आते हैं।