आज भी खड़ा

चण्डी देवी मन्दिर, हरिद्वार

हरिद्वार के सामने गंगा पार नील पर्वत पर चण्डिका का मन्दिर, जहाँ शुम्भ-निशुम्भ वध के बाद देवी के विश्राम की कथा है। यह हरिद्वार के तीन सिद्धपीठों में से एक है।

निर्माण: परम्परा के अनुसार मूर्ति आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित; वर्तमान मन्दिर 1929, कश्मीर के राजा सुचत सिंहस्थान: उत्तराखण्ड (हरिद्वार)देवता: माता चण्डी (चण्डिका)29.93° N, 78.18° E
  1. 1929
चित्र: World8115 · CC BY 3.0

01नील पर्वत पर चण्डिका

दुर्गा सप्तशती बताती है कि शुम्भ और निशुम्भ नामक असुर भाइयों ने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया, और उनसे युद्ध के लिए माता पार्वती के शरीर से एक तेजस्वी देवी प्रकट हुईं। उनके क्रोध से चामुण्डा प्रकट हुईं, जिन्होंने चण्ड और मुण्ड का वध किया; फिर स्वयं चण्डिका ने दोनों भाइयों का संहार किया। हरिद्वार की परम्परा कहती है कि इसके बाद देवी ने शिवालिक के इसी शिखर पर विश्राम किया। मन्दिर का अपना वृत्तान्त कहता है कि गर्भगृह की मूर्ति हिमालय के धामों की ओर जाते हुए आदि शंकराचार्य ने स्थापित की।

02कश्मीरी राजा का मन्दिर

वर्तमान भवन 1929 में बना, जिसके निर्माता मन्दिर के अभिलेखों में कश्मीर के राजा सुचत सिंह बताए गए हैं। पास ही हनुमान जी की माता अंजना का छोटा मन्दिर है। यह पहाड़ी हरिद्वार के पंच तीर्थ परिक्रमा का अंग है, और जो मनसा देवी चढ़ते हैं वे प्रायः उसी दिन नदी पार करके चण्डी देवी भी जाते हैं। नजीबाबाद मार्ग से रोपवे ऊपर जाता है; लगभग तीन किलोमीटर का पुराना पैदल रास्ता भी चलता है।

इस स्थान की जीवन-गाथा

  1. 1929राजा सुचत सिंह के समय वर्तमान मन्दिर बनता है।
दर्शन और यात्रा

रोपवे का आधार हर की पौड़ी से लगभग 4 किमी दूर, चण्डी घाट पुल पार करके नजीबाबाद मार्ग पर है।