प्र ते॒ धारा॑ अस॒श्चतो॑ दि॒वो न य॑न्ति वृ॒ष्टय॑ः ।
अच्छा॒ वाजं॑ सह॒स्रिण॑म्
pra te dhārā asaścato divo na yanti vṛṣṭayaḥ |
acchā vājaṃ sahasriṇam
ऋषि: अवत्सारः काश्यपः · देवता: पवमानः सोमः · छन्द: गायत्री
4 श्लोक · 57 में से 114
अवत्सार काश्यप का पाँचवाँ गायत्री सूक्त। सोम की अविराम धाराएँ द्युलोक की वर्षा की भाँति सहस्रगुण लाभ की ओर बढ़ती हैं। कवियों की सब प्रिय रचनाओं को देखते हुए पिंगल सोम अपने आयुध चलाते हुए बहते हैं। मनुष्यों द्वारा मार्जित होकर वे व्रत के पक्के राजा की भाँति, वृक्षों पर उतरते श्येन की भाँति बैठते हैं। पवित्र होते इन्दु से द्युलोक और पृथिवी के सब धन लाने की प्रार्थना है।
प्र ते॒ धारा॑ अस॒श्चतो॑ दि॒वो न य॑न्ति वृ॒ष्टय॑ः ।
अच्छा॒ वाजं॑ सह॒स्रिण॑म्
pra te dhārā asaścato divo na yanti vṛṣṭayaḥ |
acchā vājaṃ sahasriṇam
अ॒भि प्रि॒याणि॒ काव्या॒ विश्वा॒ चक्षा॑णो अर्षति ।
हरि॑स्तुञ्जा॒न आयु॑धा
abhi priyāṇi kāvyā viśvā cakṣāṇo arṣati |
haristuñjāna āyudhā
स म॑र्मृजा॒न आ॒युभि॒रिभो॒ राजे॑व सुव्र॒तः ।
श्ये॒नो न वंसु॑ षीदति
sa marmṛjāna āyubhiribho rājeva suvrataḥ |
śyeno na vaṃsu ṣīdati
स नो॒ विश्वा॑ दि॒वो वसू॒तो पृ॑थि॒व्या अधि॑ ।
पु॒ना॒न इ॑न्द॒वा भ॑र
sa no viśvā divo vasūto pṛthivyā adhi |
punāna indavā bhara
पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)