अष्टम मण्डल

सूक्त 81: दाहिने हाथ से धन भर लाओ

ऋषि: कुसीदी काण्वः · देवता: इन्द्रः · छन्द: गायत्री

9 श्लोक · 81 में से 103

इस अध्याय में क्या होता है

दाहिने हाथ से धन भर लाओ

कुसीदी काण्व विशाल हाथ वाले इन्द्र से कहते हैं कि दाहिने हाथ से चमकता हुआ, भरपूर मुट्ठी भर धन पकड़ो और यहाँ ले आओ। हम तुम्हें कर्मों में महान, दान और धन में महान, सहायता में विशाल जानते हैं। जब तुम देना चाहते हो, तब न देव रोक पाते हैं न मनुष्य, जैसे कोई भयंकर वृषभ को नहीं रोक पाता। आओ, धन के स्वामी, स्वराज इन्द्र की स्तुति करें, वे दान में हमें निराश न करें। दाहिने हाथ से भरकर दो, बाएँ हाथ से हमें छुओ, हमें धन से अलग मत करो। साहस से आगे बढ़ो और जो नहीं देता उसका धन हमारे लिए ले आओ।

81.1

आ तू न॑ इन्द्र क्षु॒मन्तं॑ चि॒त्रं ग्रा॒भं सं गृ॑भाय ।
म॒हा॒ह॒स्ती दक्षि॑णेन

ā tū na indra kṣumantaṃ citraṃ grābhaṃ saṃ gṛbhāya |
mahāhastī dakṣiṇena

81.2

वि॒द्मा हि त्वा॑ तुविकू॒र्मिं तु॒विदे॑ष्णं तु॒वीम॑घम् ।
तु॒वि॒मा॒त्रमवो॑भिः

vidmā hi tvā tuvikūrmiṃ tuvideṣṇaṃ tuvīmagham |
tuvimātramavobhiḥ

81.3

न॒हि त्वा॑ शूर दे॒वा न मर्ता॑सो॒ दित्स॑न्तम् ।
भी॒मं न गां वा॒रय॑न्ते

nahi tvā śūra devā na martāso ditsantam |
bhīmaṃ na gāṃ vārayante

81.4

एतो॒ न्विन्द्रं॒ स्तवा॒मेशा॑नं॒ वस्व॑ः स्व॒राज॑म् ।
न राध॑सा मर्धिषन्नः

eto nvindraṃ stavāmeśānaṃ vasvaḥ svarājam |
na rādhasā mardhiṣannaḥ

81.5

प्र स्तो॑ष॒दुप॑ गासिष॒च्छ्रव॒त्साम॑ गी॒यमा॑नम् ।
अ॒भि राध॑सा जुगुरत्

pra stoṣadupa gāsiṣacchravatsāma gīyamānam |
abhi rādhasā jugurat

81.6

आ नो॑ भर॒ दक्षि॑णेना॒भि स॒व्येन॒ प्र मृ॑श ।
इन्द्र॒ मा नो॒ वसो॒र्निर्भा॑क्

ā no bhara dakṣiṇenābhi savyena pra mṛśa |
indra mā no vasornirbhāk

81.7

उप॑ क्रम॒स्वा भ॑र धृष॒ता धृ॑ष्णो॒ जना॑नाम् ।
अदा॑शूष्टरस्य॒ वेद॑ः

upa kramasvā bhara dhṛṣatā dhṛṣṇo janānām |
adāśūṣṭarasya vedaḥ

81.8

इन्द्र॒ य उ॒ नु ते॒ अस्ति॒ वाजो॒ विप्रे॑भि॒ः सनि॑त्वः ।
अ॒स्माभि॒ः सु तं स॑नुहि

indra ya u nu te asti vājo viprebhiḥ sanitvaḥ |
asmābhiḥ su taṃ sanuhi

81.9

स॒द्यो॒जुव॑स्ते॒ वाजा॑ अ॒स्मभ्यं॑ वि॒श्वश्च॑न्द्राः ।
वशै॑श्च म॒क्षू ज॑रन्ते

sadyojuvaste vājā asmabhyaṃ viśvaścandrāḥ |
vaśaiśca makṣū jarante

पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)