महर्षि वसिष्ठ कहते हैं कि उषा ने चमककर मनुष्यों के मार्ग प्रकाशित किये और पाँचों जनों को जगाया। अपने सुन्दर वृषभों से उसने प्रकाश फैलाया और सूर्य ने अपनी दृष्टि से द्युलोक और पृथ्वी को खोल दिया। उषाएँ आकाश के छोरों पर अपने रंग सजाती हैं और काम में जुते लोगों की भाँति प्रयत्न करती हैं, उनकी किरणें अन्धकार को लपेट देती हैं और सविता की फैली भुजाओं-सी ज्योति देती हैं। वह सुकर्मी को धन देती है। ऋषि उससे उतना ही दान माँगते हैं जितना उसने पहले के स्तोताओं को दिया, वह जो वृषभ की गर्जना पर जन्मी जब पर्वत के द्वार खुले।