सप्तम मण्डल

सूक्त 79: उषा पाँचों जनों को जगाती है

ऋषि: मैत्रावरुणिर्वसिष्ठः · देवता: उषसः · छन्द: त्रिष्टुप्

5 श्लोक · 79 में से 104

इस अध्याय में क्या होता है

उषा पाँचों जनों को जगाती है

महर्षि वसिष्ठ कहते हैं कि उषा ने चमककर मनुष्यों के मार्ग प्रकाशित किये और पाँचों जनों को जगाया। अपने सुन्दर वृषभों से उसने प्रकाश फैलाया और सूर्य ने अपनी दृष्टि से द्युलोक और पृथ्वी को खोल दिया। उषाएँ आकाश के छोरों पर अपने रंग सजाती हैं और काम में जुते लोगों की भाँति प्रयत्न करती हैं, उनकी किरणें अन्धकार को लपेट देती हैं और सविता की फैली भुजाओं-सी ज्योति देती हैं। वह सुकर्मी को धन देती है। ऋषि उससे उतना ही दान माँगते हैं जितना उसने पहले के स्तोताओं को दिया, वह जो वृषभ की गर्जना पर जन्मी जब पर्वत के द्वार खुले।

79.1

व्यु१॒॑षा आ॑वः प॒थ्या॒३॒॑ जना॑नां॒ पञ्च॑ क्षि॒तीर्मानु॑षीर्बो॒धय॑न्ती ।
सु॒सं॒दृग्भि॑रु॒क्षभि॑र्भा॒नुम॑श्रे॒द्वि सूर्यो॒ रोद॑सी॒ चक्ष॑सावः

vyuṣā āvaḥ pathyā janānāṃ pañca kṣitīrmānuṣīrbodhayantī |
susaṃdṛgbhirukṣabhirbhānumaśredvi sūryo rodasī cakṣasāvaḥ

79.2

व्य॑ञ्जते दि॒वो अन्ते॑ष्व॒क्तून्विशो॒ न यु॒क्ता उ॒षसो॑ यतन्ते ।
सं ते॒ गाव॒स्तम॒ आ व॑र्तयन्ति॒ ज्योति॑र्यच्छन्ति सवि॒तेव॑ बा॒हू

vyañjate divo anteṣvaktūnviśo na yuktā uṣaso yatante |
saṃ te gāvastama ā vartayanti jyotiryacchanti saviteva bāhū

79.3

अभू॑दु॒षा इन्द्र॑तमा म॒घोन्यजी॑जनत्सुवि॒ताय॒ श्रवां॑सि ।
वि दि॒वो दे॒वी दु॑हि॒ता द॑धा॒त्यङ्गि॑रस्तमा सु॒कृते॒ वसू॑नि

abhūduṣā indratamā maghonyajījanatsuvitāya śravāṃsi |
vi divo devī duhitā dadhātyaṅgirastamā sukṛte vasūni

79.4

ताव॑दुषो॒ राधो॑ अ॒स्मभ्यं॑ रास्व॒ याव॑त्स्तो॒तृभ्यो॒ अर॑दो गृणा॒ना ।
यां त्वा॑ ज॒ज्ञुर्वृ॑ष॒भस्या॒ रवे॑ण॒ वि दृ॒ळ्हस्य॒ दुरो॒ अद्रे॑रौर्णोः

tāvaduṣo rādho asmabhyaṃ rāsva yāvatstotṛbhyo arado gṛṇānā |
yāṃ tvā jajñurvṛṣabhasyā raveṇa vi dṛḻhasya duro adreraurṇoḥ

79.5

दे॒वंदे॑वं॒ राध॑से चो॒दय॑न्त्यस्म॒द्र्य॑क्सू॒नृता॑ ई॒रय॑न्ती ।
व्यु॒च्छन्ती॑ नः स॒नये॒ धियो॑ धा यू॒यं पा॑त स्व॒स्तिभि॒ः सदा॑ नः

devaṃdevaṃ rādhase codayantyasmadryaksūnṛtā īrayantī |
vyucchantī naḥ sanaye dhiyo dhā yūyaṃ pāta svastibhiḥ sadā naḥ

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