अ॒भ्य॑व॒स्थाः प्र जा॑यन्ते॒ प्र व॒व्रेर्व॒व्रिश्चि॑केत ।
उ॒पस्थे॑ मा॒तुर्वि च॑ष्टे
abhyavasthāḥ pra jāyante pra vavrervavriściketa |
upasthe māturvi caṣṭe
ऋषि: वव्रिरात्रेयः · देवता: अग्निः · छन्द: गायत्री, ३-४ अनुष्टुप्, ५ विराड्रूपा
5 श्लोक · 19 में से 87
आत्रेय वव्रि गायत्री, अनुष्टुप् और अन्तिम विराट् में अग्निदेव का गान करते हैं। सूक्त संक्षिप्त है और पहेली-भरा। नई अवस्थाएँ प्रकट होती हैं; वव्रि अपने आवरण के भीतर से जानते हैं, और अग्नि माता की गोद से देखते हैं। सजग लोग अनिमेष बल को अर्पित करते और उसकी रक्षा करते हैं; वे दृढ़ पुर में प्रवेश करते हैं। श्वैत्रेय की प्रजा तेज में बढ़ती है; सोने का हार पहने अग्नि उस तप्त पात्र जैसे हैं जिसके उदर में बल भरा है। अन्तिम मन्त्र कहता है कि वे वायु को जानते हुए ज्वाला की रस्सी में क्रीड़ा करें, उनकी जिह्वाएँ भली भाँति पैनी धार जैसी हैं।
अ॒भ्य॑व॒स्थाः प्र जा॑यन्ते॒ प्र व॒व्रेर्व॒व्रिश्चि॑केत ।
उ॒पस्थे॑ मा॒तुर्वि च॑ष्टे
abhyavasthāḥ pra jāyante pra vavrervavriściketa |
upasthe māturvi caṣṭe
जु॒हु॒रे वि चि॒तय॒न्तोऽनि॑मिषं नृ॒म्णं पा॑न्ति ।
आ दृ॒ळ्हां पुरं॑ विविशुः
juhure vi citayanto'nimiṣaṃ nṛmṇaṃ pānti |
ā dṛḻhāṃ puraṃ viviśuḥ
आ श्वै॑त्रे॒यस्य॑ ज॒न्तवो॑ द्यु॒मद्व॑र्धन्त कृ॒ष्टय॑ः ।
नि॒ष्कग्री॑वो बृ॒हदु॑क्थ ए॒ना मध्वा॒ न वा॑ज॒युः
ā śvaitreyasya jantavo dyumadvardhanta kṛṣṭayaḥ |
niṣkagrīvo bṛhaduktha enā madhvā na vājayuḥ
प्रि॒यं दु॒ग्धं न काम्य॒मजा॑मि जा॒म्योः सचा॑ ।
घ॒र्मो न वाज॑जठ॒रोऽद॑ब्ध॒ः शश्व॑तो॒ दभ॑ः
priyaṃ dugdhaṃ na kāmyamajāmi jāmyoḥ sacā |
gharmo na vājajaṭharo'dabdhaḥ śaśvato dabhaḥ
क्रीळ॑न्नो रश्म॒ आ भु॑व॒ः सं भस्म॑ना वा॒युना॒ वेवि॑दानः ।
ता अ॑स्य सन्धृ॒षजो॒ न ति॒ग्माः सुसं॑शिता व॒क्ष्यो॑ वक्षणे॒स्थाः
krīḻanno raśma ā bhuvaḥ saṃ bhasmanā vāyunā vevidānaḥ |
tā asya sandhṛṣajo na tigmāḥ susaṃśitā vakṣyo vakṣaṇesthāḥ
पाठ का स्रोत: Wikisource · CC BY-SA 4.0 (Wikisource transcription of a public-domain text)