अग्ने॑ मृ॒ळ म॒हाँ अ॑सि॒ य ई॒मा दे॑व॒युं जन॑म् ।
इ॒येथ॑ ब॒र्हिरा॒सद॑म्
agne mṛḻa mahām̐ asi ya īmā devayuṃ janam |
iyetha barhirāsadam
ऋषि: वामदेवो गौतमः · देवता: अग्निः · छन्द: गायत्री
8 श्लोक · 9 में से 58
वामदेव गौतम गायत्री मन्त्रों में अग्नि से कृपा माँगते हैं। महान अग्नि भक्त के पास बर्हि पर बैठने आते हैं। मनुष्यों की प्रजाओं में अजेय, वे सबके दूत हैं। उन्हें आनन्दमय होता बनाकर घर के चारों ओर ले जाया जाता है, और वे पोता बनकर भी बैठते हैं; वे यज्ञ में देवपत्नियाँ हैं, घर के गृहपति हैं, और ब्रह्मा बनकर भी बैठते हैं। वे यज्ञ करने वालों के लिए बोलते हैं और मनुष्यों की हवि ले जाते हैं। ऋषि अङ्गिरा अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि हमारा यज्ञ स्वीकारें, हमारी पुकार सुनें, और उनका अजेय रथ हमें चारों ओर से घेरे रहे।
अग्ने॑ मृ॒ळ म॒हाँ अ॑सि॒ य ई॒मा दे॑व॒युं जन॑म् ।
इ॒येथ॑ ब॒र्हिरा॒सद॑म्
agne mṛḻa mahām̐ asi ya īmā devayuṃ janam |
iyetha barhirāsadam
स मानु॑षीषु दू॒ळभो॑ वि॒क्षु प्रा॒वीरम॑र्त्यः ।
दू॒तो विश्वे॑षां भुवत्
sa mānuṣīṣu dūḻabho vikṣu prāvīramartyaḥ |
dūto viśveṣāṃ bhuvat
स सद्म॒ परि॑ णीयते॒ होता॑ म॒न्द्रो दिवि॑ष्टिषु ।
उ॒त पोता॒ नि षी॑दति
sa sadma pari ṇīyate hotā mandro diviṣṭiṣu |
uta potā ni ṣīdati
उ॒त ग्ना अ॒ग्निर॑ध्व॒र उ॒तो गृ॒हप॑ति॒र्दमे॑ ।
उ॒त ब्र॒ह्मा नि षी॑दति
uta gnā agniradhvara uto gṛhapatirdame |
uta brahmā ni ṣīdati
वेषि॒ ह्य॑ध्वरीय॒तामु॑पव॒क्ता जना॑नाम् ।
ह॒व्या च॒ मानु॑षाणाम्
veṣi hyadhvarīyatāmupavaktā janānām |
havyā ca mānuṣāṇām
वेषीद्व॑स्य दू॒त्यं१॒॑ यस्य॒ जुजो॑षो अध्व॒रम् ।
ह॒व्यं मर्त॑स्य॒ वोळ्ह॑वे
veṣīdvasya dūtyaṃ yasya jujoṣo adhvaram |
havyaṃ martasya voḻhave
अ॒स्माकं॑ जोष्यध्व॒रम॒स्माकं॑ य॒ज्ञम॑ङ्गिरः ।
अ॒स्माकं॑ शृणुधी॒ हव॑म्
asmākaṃ joṣyadhvaramasmākaṃ yajñamaṅgiraḥ |
asmākaṃ śṛṇudhī havam
परि॑ ते दू॒ळभो॒ रथो॒ऽस्माँ अ॑श्नोतु वि॒श्वत॑ः ।
येन॒ रक्ष॑सि दा॒शुष॑ः
pari te dūḻabho ratho'smām̐ aśnotu viśvataḥ |
yena rakṣasi dāśuṣaḥ
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