दशम मण्डल

सूक्त 126: द्वेष से पार ले जाने वाले आदित्य

ऋषि: शैलूषिः कुल्मलबर्हिषः, वामदेव्योंऽहोमुग्वा · देवता: विश्वे देवाः · छन्द: उपरिष्टाद्बृहती, ८ त्रिष्टुप्

8 श्लोक · 126 में से 191

इस अध्याय में क्या होता है

द्वेष से पार ले जाने वाले आदित्य

कुल्मलबर्हिष शैलूषि, अथवा वामदेव्य अंहोमुच्, उपरिष्टाद्बृहती में, अंत में त्रिष्टुप् में, विश्वेदेवों को पुकारते हैं। हर मन्त्र की टेक है: द्वेषों से पार। जिस मनुष्य को अर्यमा, मित्र और वरुण मिलकर शत्रुओं से पार ले जाते हैं, उस तक न पाप पहुँचता है न संकट। हम वह रक्षा चुनते हैं जिससे तुम पाप से बचाते हो। वरुण, मित्र और अर्यमा सबसे अच्छे नेता हैं, सबसे अच्छे पार कराने वाले। गायक कल्याण के लिए मरुतों सहित उग्र रुद्र, इन्द्र और अग्नि को भी पुकारते हैं। अंतिम प्रार्थना: जैसे वसुओं ने पैर से बँधी गौरी को छुड़ाया, वैसे हमें पाप से छुड़ाओ, और हे अग्नि, हमारी आयु बढ़ाओ।

126.1

न तमंहो॒ न दु॑रि॒तं देवा॑सो अष्ट॒ मर्त्य॑म् ।
स॒जोष॑सो॒ यम॑र्य॒मा मि॒त्रो नय॑न्ति॒ वरु॑णो॒ अति॒ द्विष॑ः

na tamaṃho na duritaṃ devāso aṣṭa martyam |
sajoṣaso yamaryamā mitro nayanti varuṇo ati dviṣaḥ

126.2

तद्धि व॒यं वृ॑णी॒महे॒ वरु॑ण॒ मित्रार्य॑मन् ।
येना॒ निरंह॑सो यू॒यं पा॒थ ने॒था च॒ मर्त्य॒मति॒ द्विष॑ः

taddhi vayaṃ vṛṇīmahe varuṇa mitrāryaman |
yenā niraṃhaso yūyaṃ pātha nethā ca martyamati dviṣaḥ

126.3

ते नू॒नं नो॒ऽयमू॒तये॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा ।
नयि॑ष्ठा उ नो ने॒षणि॒ पर्षि॑ष्ठा उ नः प॒र्षण्यति॒ द्विष॑ः

te nūnaṃ no'yamūtaye varuṇo mitro aryamā |
nayiṣṭhā u no neṣaṇi parṣiṣṭhā u naḥ parṣaṇyati dviṣaḥ

126.4

यू॒यं विश्वं॒ परि॑ पाथ॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा ।
यु॒ष्माकं॒ शर्म॑णि प्रि॒ये स्याम॑ सुप्रणीत॒योऽति॒ द्विष॑ः

yūyaṃ viśvaṃ pari pātha varuṇo mitro aryamā |
yuṣmākaṃ śarmaṇi priye syāma supraṇītayo'ti dviṣaḥ

126.5

आ॒दि॒त्यासो॒ अति॒ स्रिधो॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा ।
उ॒ग्रं म॒रुद्भी॑ रु॒द्रं हु॑वे॒मेन्द्र॑म॒ग्निं स्व॒स्तयेऽति॒ द्विष॑ः

ādityāso ati sridho varuṇo mitro aryamā |
ugraṃ marudbhī rudraṃ huvemendramagniṃ svastaye'ti dviṣaḥ

126.6

नेता॑र ऊ॒ षु ण॑स्ति॒रो वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा ।
अति॒ विश्वा॑नि दुरि॒ता राजा॑नश्चर्षणी॒नामति॒ द्विष॑ः

netāra ū ṣu ṇastiro varuṇo mitro aryamā |
ati viśvāni duritā rājānaścarṣaṇīnāmati dviṣaḥ

126.7

शु॒नम॒स्मभ्य॑मू॒तये॒ वरु॑णो मि॒त्रो अ॑र्य॒मा ।
शर्म॑ यच्छन्तु स॒प्रथ॑ आदि॒त्यासो॒ यदीम॑हे॒ अति॒ द्विष॑ः

śunamasmabhyamūtaye varuṇo mitro aryamā |
śarma yacchantu sapratha ādityāso yadīmahe ati dviṣaḥ

126.8

यथा॑ ह॒ त्यद्व॑सवो गौ॒र्यं॑ चित्प॒दि षि॒ताममु॑ञ्चता यजत्राः ।
ए॒वो ष्व१॒॑स्मन्मु॑ञ्चता॒ व्यंह॒ः प्र ता॑र्यग्ने प्रत॒रं न॒ आयु॑ः

yathā ha tyadvasavo gauryaṃ citpadi ṣitāmamuñcatā yajatrāḥ |
evo ṣvasmanmuñcatā vyaṃhaḥ pra tāryagne prataraṃ na āyuḥ

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