चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणं
श्रेयःकैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधूजीवनम्।
आनन्दाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनं
सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्णसङ्कीर्तनम्॥१॥
नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति-
स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि
दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥२॥
तृणादपि सुनीचेन तरोरिव सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥३॥
न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद्भक्तिरहैतुकी त्वयि॥४॥
अयि नन्दतनुज किङ्करं पतितं मां विषमे भवाम्बुधौ।
कृपया तव पादपङ्कज-स्थितधूलीसदृशं विचिन्तय॥५॥
नयनं गलदश्रुधारया वदनं गद्गदरुद्धया गिरा।
पुलकैर्निचितं वपुः कदा तव नामग्रहणे भविष्यति॥६॥
युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्।
शून्यायितं जगत्सर्वं गोविन्दविरहेण मे॥७॥
आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु मा-
मदर्शनान्मर्महतां करोतु वा।
यथा तथा वा विदधातु लम्पटो
मत्प्राणनाथस्तु स एव नापरः॥८॥
Ceto-darpana-marjanam bhava-maha-davagni-nirvapanam
shreyah-kairava-chandrika-vitaranam vidya-vadhu-jivanam,
anandambudhi-vardhanam prati-padam purnamritasvadanam
sarvatma-snapanam param vijayate Shri-Krishna-sankirtanam.
Namnam akari bahudha nija-sarva-shaktis
tatrarpita niyamitah smarane na kalah,
etadrishi tava kripa bhagavan mamapi
durdaivam idrisham ihajani nanuragah.
Trinad api sunichena taror iva sahishnuna,
amanina manadena kirtaniyah sada Harih.
Na dhanam na janam na sundarim kavitam va jagadisha kamaye,
mama janmani janmanishvare bhavatad bhaktir ahaituki tvayi.
Ayi Nanda-tanuja kinkaram patitam mam vishame bhavambudhau,
kripaya tava pada-pankaja-sthita-dhuli-sadrisham vichintaya.
Nayanam galad-ashru-dharaya vadanam gadgada-ruddhaya gira,
pulakair nichitam vapuh kada tava nama-grahane bhavishyati.
Yugayitam nimeshena chakshusha pravrishayitam,
shunyayitam jagat sarvam Govinda-virahena me.
Ashlishya va pada-ratam pinashtu mam
adarshanan marma-hatam karotu va,
yatha tatha va vidadhatu lampato
mat-prana-nathas tu sa eva naparah.
अर्थ
श्रीकृष्ण-संकीर्तन की परम विजय हो! यह हृदय रूपी दर्पण को साफ़ करता है और संसार रूपी महा दावानल को बुझाता है। यह कल्याण रूपी कुमुदिनी को खिलाने वाली चाँदनी फैलाता है और विद्या रूपी वधू का जीवन है। यह आनंद के सागर को बढ़ाता है, हर पद पर पूर्ण अमृत का स्वाद देता है, और संपूर्ण आत्मा को नहला देता है।
हे प्रभु, आपने अपने अनेक नाम प्रकट किए और हर नाम में अपनी सारी शक्ति रख दी, और उनके स्मरण के लिए समय का कोई नियम नहीं रखा। हे भगवान, आपकी ऐसी कृपा है, फिर भी मेरा ऐसा दुर्भाग्य है कि उनमें मेरा अनुराग नहीं जागा।
तिनके से भी अधिक नम्र होकर, वृक्ष से भी अधिक सहनशील होकर, स्वयं मान न चाहते हुए और सबको मान देते हुए, सदा हरि का कीर्तन करना चाहिए।
हे जगदीश, मुझे न धन चाहिए, न अनुयायी, न सुंदर स्त्री, न कविता। हे ईश्वर, जन्म-जन्म में मुझे आपकी अहैतुकी भक्ति ही मिले।
हे नंदनंदन, मैं आपका दास संसार के विषम सागर में गिरा हुआ हूँ। कृपा करके मुझे अपने चरण-कमलों में लगी धूल का एक कण समझिए।
आपका नाम लेते हुए कब मेरी आँखों से आँसुओं की धारा बहेगी, कब मेरी वाणी गद्गद होकर रुक जाएगी, और कब मेरा शरीर पुलक से भर जाएगा?
गोविंद के विरह में मेरे लिए एक क्षण युग के समान हो गया है, आँखें वर्षा ऋतु की तरह बरस रही हैं, और सारा संसार सूना लगता है।
वे अपने चरणों में अनुरक्त मुझे गले लगाएँ या कुचल दें, या दर्शन न देकर मेरा हृदय तोड़ दें; वे लीलामय प्रियतम जैसा चाहें करें, मेरे प्राणनाथ तो वही हैं, कोई दूसरा नहीं।
इस भजन के बारे में
श्री चैतन्य महाप्रभु ने लिखित रूप में केवल ये आठ श्लोक छोड़े। चैतन्य चरितामृत (अंत्य लीला 20) बताता है कि पुरी में अपने अंतिम वर्षों में वे रात भर स्वरूप दामोदर और रामानंद राय को ये श्लोक सुनाते और हर एक का रस लेते थे। इनमें पूरा गौड़ीय मार्ग है: नाम की शक्ति, कीर्तन में नम्रता (तीसरा श्लोक, “तृणादपि सुनीचेन”, सबसे अधिक उद्धृत है), निष्काम भक्ति, और अंत में राधा-प्रेम की व्याकुलता और समर्पण। गौड़ीय वैष्णव इनका नित्य पाठ करते हैं, और उनके प्राकट्य दिवस गौर पूर्णिमा पर विशेष रूप से।
Shikshashtakam; Chaitanya Charitamrita, Antya Lila 20.12, 16, 21, 29, 32, 36, 39, 47 (checked against the BBT edition on Vedabase)
