गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती॥
धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलंत जोती॥१॥
कैसी आरती होइ भव खंडना तेरी आरती॥
अनहता सबद वाजंत भेरी॥१॥ रहाउ॥
सहस तव नैन नन नैन है तोहि कउ सहस मूरति नना एक तोही॥
सहस पद बिमल नन एक पद गंध बिनु सहस तव गंध इव चलत मोही॥२॥
सभ महि जोति जोति है सोइ॥
तिस कै चानणि सभ महि चानणु होइ॥
गुर साखी जोति परगटु होइ॥
जो तिसु भावै सु आरती होइ॥३॥
हरि चरण कमल मकरंद लोभित मनो अनदिनो मोहि आही पिआसा॥
क्रिपा जलु देहि नानक सारिंग कउ होइ जा ते तेरै नामि वासा॥४॥१॥७॥९॥
Gagan mai thalu ravi chandu dipak bane tarika mandal janak moti,
dhupu malaanalo pavanu chavaro kare sagal banrai phulant joti.
Kaisi arati hoi bhav khandana teri arati,
anahata sabad vajant bheri. Rahau.
Sahas tav nain nan nain hai tohi kau sahas murati nana ek tohi,
sahas pad bimal nan ek pad gandh binu sahas tav gandh iv chalat mohi.
Sabh mahi joti joti hai soi,
tis kai chanani sabh mahi chananu hoi,
gur sakhi joti paragatu hoi,
jo tisu bhavai su arati hoi.
Hari charan kamal makarand lobhit mano anadino mohi ahi piasa,
kripa jalu dehi Nanak sarang kau hoi ja te terai nami vasa.
अर्थ
आकाश थाल है, सूर्य और चंद्रमा दीपक हैं, तारों के मंडल मानो मोती हैं। मलय पर्वत से आती सुगंधित वायु धूप है, पवन चँवर डुलाता है, और सारी वनस्पति, हे ज्योति स्वरूप, आपके लिए फूल बनकर खिली है।
कैसी सुंदर आरती हो रही है! हे भय का नाश करने वाले, यह आपकी आरती है। अनहद नाद ही नगाड़ा बनकर बज रहा है।
आपकी हज़ारों आँखें हैं, फिर भी आपकी कोई आँख नहीं; हज़ारों रूप हैं, फिर भी एक भी रूप नहीं; हज़ारों निर्मल चरण हैं, फिर भी एक भी चरण नहीं; नासिका नहीं, फिर भी हज़ारों नासिकाएँ हैं। आपकी इस लीला ने मुझे मोह लिया है।
सबमें ज्योति है, और वह ज्योति आप ही हैं। उसी के प्रकाश से सबमें प्रकाश है। गुरु की शिक्षा से वह ज्योति प्रकट होती है। जो उसे भाए, वही सच्ची आरती है।
हरि के चरण-कमलों के मकरंद का लोभी मेरा मन दिन-रात प्यासा रहता है। नानक रूपी प्यासे पपीहे को कृपा का जल दीजिए, जिससे वह आपके नाम में बसा रहे।
इस भजन के बारे में
सिख परंपरा में जनमसाखियाँ बताती हैं कि गुरु नानक देव जी जगन्नाथ पुरी में थे जब संध्या आरती हो रही थी, और उन्होंने वहाँ यह शबद गाया: ऐसी आरती जिसमें पूरा आकाश थाल है और तारे उसके मोती। गुरुद्वारों में यह हर रात सोहिला के भाग के रूप में पढ़ा जाता है, और बहुत से हिंदू सत्संगों का समापन भी इसी से होता है। रवींद्रनाथ ठाकुर इसके बड़े प्रशंसक थे। धार्मिक परिवार की एक बहन-परंपरा के, एक ही ज्योति के इस गीत को यहाँ आदर से रखा गया है।
Sri Guru Granth Sahib, Raag Dhanasari, Mahala 1, Aarti, ang 663 (Devanagari transliteration via BaniDB; the original is in Gurmukhi)
