संभाजी का जंजीरा घेरा

पक्षमराठाछत्रपति संभाजी
1682 ई.बनाम
विजेताजंजीरा के सिद्दी (मुग़लों के मित्र)सिद्दी क़ासिम (याक़ूत ख़ान)

संभाजी ने उस समुद्री दुर्ग जंजीरा को लेने का प्रयास किया जो उनके पिता के सामने भी अजेय रहा था, यहाँ तक कि चैनल को पत्थरों से पाटने का प्रयास भी, पर औरंगज़ेब से युद्ध ने उन्हें वापस बुला लिया।

तिथि: 1681–1682 ई.स्थान: मुरुड-जंजीरा, रायगढ़ ज़िला, महाराष्ट्रप्रकार: घेराबंदी
चित्र: Amitabha Gupta · CC BY 4.0
परिणाम

द्वीप-दुर्ग टिका रहा; मुग़ल सेना के उनके प्रदेश पर टूटने पर संभाजी को घेरा उठाना पड़ा।

01समुद्र में किला

जंजीरा मुरुड के सामने समुद्र में एक चट्टान पर खड़ा है, जिसकी दीवारें सीधे पानी से उठती हैं। उसके अबीसीनियाई मूल के सिद्दी स्वामी पहले बीजापुर और फिर मुग़लों की सेवा में रहे, और उनका बेड़ा कोंकण के गाँवों पर धावे बोलकर लोगों को उठा ले जाता था। शिवाजी ने इसे एक से अधिक बार घेरा और सफल नहीं हुए। 1681 में अभिषिक्त संभाजी ने इसे अपना पहला बड़ा युद्ध बनाया। उनकी तोपों ने तट से और कासा द्वीप से किले पर गोले बरसाए, और उस समय के मराठा विवरण और अंग्रेज़ पत्र उनके उस प्रयास की चर्चा करते हैं जिसमें पत्थर और लकड़ी से चैनल पाटकर सैनिकों को पैदल पार कराना था।

02वापस बुलावा

वर्षा और समुद्र ने काम बिगाड़ दिया, और सिद्दी बेड़े ने कई बार मराठा नाकेबंदी तोड़ी। तभी औरंगज़ेब, जो 1681 में साम्राज्य की पूरी शक्ति लेकर स्वयं दक्षिण आया था, ने हसन अली ख़ान को कोंकण में भेजा। संभाजी ने जंजीरा के सामने एक टुकड़ी छोड़ी और अपने राज्य की रक्षा के लिए मुड़े। मराठे जंजीरा कभी नहीं जीत सके, और सिद्दी भारत की स्वतंत्रता तक उस पर बने रहे।

छत्रपति संभाजी महाराज
व्यक्तित्व · 1657–1689 ई.; शासन 1681–1689छत्रपति संभाजी महाराजशिवाजी के ज्येष्ठ पुत्र ने नौ वर्ष तक एक साथ औरंगज़ेब की पूरी शाही सेना, सिद्दियों, पुर्तगालियों और मैसूर के विरुद्ध मराठा राज्य थामे रखा; 1689 में संगमेश्वर में पकड़े जाकर यातनाएँ सहते हुए 11 मार्च 1689 को तुलापुर में उनका वध किया गया।पढ़ें →
महत्त्व

जंजीरा कोंकण तट का वह एक किला था जिसे मराठे कभी नहीं जीत सके, और वहाँ संभाजी की विफलता औरंगज़ेब के लम्बे दक्कन युद्ध के आरम्भ के साथ आई।