लगभग दो मास और दीवार तोड़ने वाली सुरंग के बाद छोटा दुर्ग शर्तों पर सौंपा गया; मुग़लों को इसकी भारी क़ीमत चुकानी पड़ी।
01मैदान का छोटा दुर्ग
औरंगज़ेब ने अपने मामा शाइस्ता ख़ाँ को दक्कन भेजा कि वह शिवाजी को कुचल दे, जो तब पन्हाळा में सिद्दी जौहर के घेरे में थे। मई 1660 में शाइस्ता ख़ाँ ने पुणे लिया और चाकण की ओर बढ़ा, जो नगर के उत्तर में खुले मैदान पर खाई से घिरा चौकोर दुर्ग था। उसके क़िलेदार फिरंगोजी नरसाळा के पास कुछ सौ सैनिक ही थे। मुग़लों ने खाइयाँ खोदीं, तोपें चढ़ाईं और सुरंग बनाने लगे। रक्षकों ने रात में खाइयों पर धावे बोले और सप्ताहों तक आक्रमणकारियों को दूर रखा।
02सुरंग और आत्मसमर्पण
अगस्त के मध्य में एक बुर्ज के नीचे सुरंग फोड़ी गई और बुर्ज ढह गया। मुग़लों ने दरार से धावा बोला, पर दुर्ग-सेना रात भर भीतर की मिट्टी की मोर्चाबंदी से लड़ती रही और आक्रमणकारियों के बहुत सैनिक मारे गए। सहायता की आशा न देख फिरंगोजी ने अगले दिन शर्तों पर दुर्ग सौंप दिया। मुग़ल अभिलेखों के आधार पर जदुनाथ सरकार लिखते हैं कि यह घेरा कितना महँगा पड़ा। शाइस्ता ख़ाँ ने रक्षक के साहस का सम्मान कर उसे अपनी सेवा का प्रस्ताव दिया; फिरंगोजी ने मना किया, शिवाजी के पास लौटे और उन्हें दूसरे दुर्ग का भार मिला।
चाकण ने मुग़लों को दिखाया कि हर मराठा दुर्ग उन्हें कितना महँगा पड़ेगा, और शाइस्ता ख़ाँ आगे बढ़ने के बजाय पुणे में जम गया; वहीं 1663 में शिवाजी ने उस पर रात का छापा मारा।
