शाइस्ता ख़ान तीन उँगलियाँ कटवाकर बचा, उसका पुत्र मारा गया, और शीघ्र ही उसे दक्कन से हटा दिया गया।
01पुणे में तीन वर्ष
औरंगज़ेब का मामा शाइस्ता ख़ान 1660 में बड़ी सेना लेकर मराठा प्रदेश में आया, कठिन घेरे के बाद चाकण लिया और पुणे में डेरा डाला। उसने लाल महल को अपना निवास बनाया, वही घर जो शहाजी ने जीजाबाई और बालक शिवाजी के लिए बनवाया था। तीन वर्ष उसकी सेना देश को खाती रही। शिवाजी खुले मैदान में उसका सामना नहीं कर सकते थे। उन्होंने उसके सिर पर चोट करना चुना।
02रात का धावा
रमज़ान का महीना था, और शाम के भोजन के बाद छावनी गहरी नींद में थी। घर की हर दीवार और गलियारे को जानने वाले शिवाजी कुछ सौ चुने हुए साथियों के साथ पुणे में घुसे, जिनमें कुछ बारात के रूप में आए थे, ईंटों से बंद एक द्वार तोड़कर भीतरी कक्षों में पहुँचे और पहरेदारों को काट डाला। शाइस्ता ख़ान एक खिड़की से भागा; तलवार के एक वार में उसकी तीन उँगलियाँ कट गईं। उसका पुत्र अबुल फ़तह और परिवार के कई लोग मारे गए। छावनी को कुछ समझ आने से पहले शिवाजी नगर से निकलकर सिंहगढ़ पर चढ़ चुके थे। क्रुद्ध औरंगज़ेब ने शाइस्ता ख़ान को बंगाल का सूबेदार बनाकर भेज दिया।

इस छापे ने दक्कन के सबसे शक्तिशाली मुग़ल सरदार को नीचा दिखाया और शिवाजी का नाम पूरे हिन्दुस्तान में ऐसे सेनानायक के रूप में फैलाया जो कहीं भी वार कर सकता था।
