कोल्हापुर का युद्ध

विजेताशिवाजी महाराज के मराठेशिवाजी महाराज
1659 ई.बनाम
पक्षबीजापुर सल्तनतरुस्तम-ए-ज़मान, फ़ज़ल ख़ाँ सहित

प्रतापगढ़ के सात सप्ताह बाद बीजापुर ने रुस्तम-ए-ज़मान और अफ़ज़ल ख़ाँ के बेटे फ़ज़ल ख़ाँ के नेतृत्व में दूसरी सेना भेजी। शिवाजी महाराज ने कोल्हापुर के पास खुले मैदान में उसका सामना कर उसे तोड़ दिया।

तिथि: 28 दिसम्बर 1659 ई.स्थान: कोल्हापुर के पास, महाराष्ट्रप्रकार: युद्ध
चित्र: Col. James Welsh · Public domain
परिणाम

शिवाजी महाराज ने एक ही सुबह में बीजापुरी सेना को खदेड़ दिया और उसके घोड़े और हाथी ले लिए।

01प्रतापगढ़ के बाद

विजय के तुरन्त बाद शिवाजी महाराज बीजापुर के प्रदेश में दक्षिण की ओर बढ़े और 28 नवम्बर 1659 को पन्हाला दुर्ग ले लिया। सल्तनत ने खोया प्रदेश वापस लेने रुस्तम-ए-ज़मान को भेजा। शिवाजी महाराज दुर्गों में बैठकर प्रतीक्षा नहीं करते रहे। उन्होंने पहले प्रहार किया; उनके घुड़सवार बीजापुरी सेना पर एक साथ कई दिशाओं से टूटे। जेधे शकावली तिथि और परिणाम दोनों दर्ज करती है: शत्रु घोड़े और हाथी छोड़कर भागा।

02मैदान की विजय

कोल्हापुर का महत्त्व इसमें था कि यह जावली के जंगलों में नहीं, खुले मैदान में लड़ा गया। इससे सिद्ध हुआ कि मराठा घुड़सवार आमने-सामने के युद्ध में सल्तनत की नियमित सेना को हरा सकते हैं। बीजापुर का उत्तर और भी बड़ा था: 1660 में उसने सिद्दी जौहर को भेजा, जिसने शिवाजी महाराज को पन्हाला में घेर लिया। बीजापुर में रुस्तम-ए-ज़मान पर शिवाजी महाराज से गुप्त सम्पर्क का सन्देह भी किया गया, जिससे उसकी सेना के इतनी जल्दी बिखरने का कारण समझ आता है।

बाजी प्रभु देशपांडे
व्यक्तित्व · मृत्यु 13 जुलाई 1660बाजी प्रभु देशपांडेहिरडस मावळ के देशपांडे बाजी प्रभु ने 13 जुलाई 1660 को कुछ सौ बांदल सैनिकों के साथ घोड़खिंड की तंग घाटी में पीछा करती बीजापुरी सेना को रोके रखा, ताकि शिवाजी विशालगढ़ पहुँच सकें। दुर्ग से तोपों की आवाज़ ने जब बताया कि राजा सुरक्षित हैं, तब तक वे लड़ते रहे। तब से यह घाटी पावनखिंड, यानी पवित्र घाटी, कहलाती है।पढ़ें →
महत्त्व

कोल्हापुर ने 1659 के बीजापुरी आक्रमण का पूरा अन्त किया और स्वराज्य को दक्षिण कोंकण और कोल्हापुर प्रदेश तक फैलाया।