अलिफ़ ख़ाँ की सेना हारी और वह रात में भाग निकला।
01कर और प्रतिरोध
शिवालिक पहाड़ियों के राजा मुग़लों को कर देते थे, और 1680 के दशक के अंत तक बहुतों पर बकाया चढ़ गया था। जम्मू के मुग़ल सेनापति ने वसूली के लिए अलिफ़ ख़ाँ को भेजा। कांगड़ा के राजा कृपाल चंद और बिझड़वाल के राजा दयाल उसके साथ हो गए। बिलासपुर राजधानी वाले कहलूर के भीम चंद ने कर देने से मना किया और पड़ोसियों तथा आनंदपुर में गुरु गोबिंद सिंह को सहायता के लिए बुलाया, यद्यपि कुछ ही वर्ष पहले दोनों भंगाणी में आपस में लड़ चुके थे। गुरु अपने सिखों के साथ आए। अलिफ़ ख़ाँ ने नादौन में ब्यास के ऊपर एक टीले पर मोर्चा बाँध रखा था।
02गुरु का अपना वर्णन
बचित्तर नाटक के नौवें अध्याय में गुरु गोबिंद सिंह ब्रज के जीवंत छंदों में युद्ध का वर्णन करते हैं: बाणों की वर्षा, ढलान पर चढ़ते भीम चंद के सैनिकों का धावा, मुग़ल पक्ष में जमकर लड़ते राजा दयाल, और अंत में अलिफ़ ख़ाँ के शिविर का टूटना। मुग़ल सेनापति रात में नदी पार भाग गया। गुरु कुछ दिन नादौन में रुककर आनंदपुर लौटे। कुछ ही समय बाद राजाओं ने मुग़लों से अपनी अलग संधि कर ली, जिसका उल्लेख गुरु बिना विशेष उत्साह के करते हैं। नादौन में गुरुद्वारा पातशाही दसवीं उनके ठहराव की याद है।

नादौन दसवें गुरु और मुग़ल सेना के बीच पहली खुली टक्कर थी, और बचित्तर नाटक के कारण यह उस युग के उन गिने-चुने भारतीय युद्धों में है जिनका वर्णन उसमें लड़े सेनापति ने स्वयं किया।
