नादौन का युद्ध

विजेताकहलूर के नेतृत्व में पहाड़ी राजा, गुरु गोबिंद सिंह के सिखों के साथकहलूर के राजा भीम चंद; गुरु गोबिंद सिंह
1691 ई.बनाम
पक्षजम्मू से भेजी मुग़ल सेना, कांगड़ा और बिझड़वाल के साथअलिफ़ ख़ाँ; कांगड़ा के राजा कृपाल चंद; बिझड़वाल के राजा दयाल

जब एक मुग़ल अधिकारी पहाड़ी राज्यों से बकाया कर वसूलने आया, तो राजा भीम चंद ने विरोध किया और गुरु गोबिंद सिंह उनके पक्ष में आए। ब्यास किनारे की इस विजय का वर्णन स्वयं गुरु ने बचित्तर नाटक में किया है।

तिथि: 1691 ई.स्थान: ब्यास किनारे नादौन, हमीरपुर ज़िला, हिमाचल प्रदेशप्रकार: युद्ध
चित्र: Dhanna Singh Chahal 'Patialvi' · Public domain
परिणाम

अलिफ़ ख़ाँ की सेना हारी और वह रात में भाग निकला।

01कर और प्रतिरोध

शिवालिक पहाड़ियों के राजा मुग़लों को कर देते थे, और 1680 के दशक के अंत तक बहुतों पर बकाया चढ़ गया था। जम्मू के मुग़ल सेनापति ने वसूली के लिए अलिफ़ ख़ाँ को भेजा। कांगड़ा के राजा कृपाल चंद और बिझड़वाल के राजा दयाल उसके साथ हो गए। बिलासपुर राजधानी वाले कहलूर के भीम चंद ने कर देने से मना किया और पड़ोसियों तथा आनंदपुर में गुरु गोबिंद सिंह को सहायता के लिए बुलाया, यद्यपि कुछ ही वर्ष पहले दोनों भंगाणी में आपस में लड़ चुके थे। गुरु अपने सिखों के साथ आए। अलिफ़ ख़ाँ ने नादौन में ब्यास के ऊपर एक टीले पर मोर्चा बाँध रखा था।

02गुरु का अपना वर्णन

बचित्तर नाटक के नौवें अध्याय में गुरु गोबिंद सिंह ब्रज के जीवंत छंदों में युद्ध का वर्णन करते हैं: बाणों की वर्षा, ढलान पर चढ़ते भीम चंद के सैनिकों का धावा, मुग़ल पक्ष में जमकर लड़ते राजा दयाल, और अंत में अलिफ़ ख़ाँ के शिविर का टूटना। मुग़ल सेनापति रात में नदी पार भाग गया। गुरु कुछ दिन नादौन में रुककर आनंदपुर लौटे। कुछ ही समय बाद राजाओं ने मुग़लों से अपनी अलग संधि कर ली, जिसका उल्लेख गुरु बिना विशेष उत्साह के करते हैं। नादौन में गुरुद्वारा पातशाही दसवीं उनके ठहराव की याद है।

गुरु गोबिंद सिंह
व्यक्तित्व · 1666–1708 ई.गुरु गोबिंद सिंहपिता की शहादत के बाद गुरु गोबिंद सिंह नौ वर्ष की आयु में गुरु बने, 1699 की वैसाखी पर आनंदपुर में खालसा की सृजना की, और मुग़लों से युद्ध में अपने चारों पुत्र खो दिए। 1708 में नांदेड़ में ज्योति जोत समाने से पहले उन्होंने ग्रंथ को शाश्वत गुरु घोषित किया।पढ़ें →
महत्त्व

नादौन दसवें गुरु और मुग़ल सेना के बीच पहली खुली टक्कर थी, और बचित्तर नाटक के कारण यह उस युग के उन गिने-चुने भारतीय युद्धों में है जिनका वर्णन उसमें लड़े सेनापति ने स्वयं किया।