दुइमुनिशिला का युद्ध और तुरबक की पराजय

विजेताअहोम राज्यसुहुङमुङ, दिहिंगिया राजा
1533 ई.बनाम
पक्षबंगाल सल्तनत की सेनातुरबक

1532–33 में बंगाल का सेनापति तुरबक ब्रह्मपुत्र के रास्ते असम में गहरे तक घुस आया। आरम्भिक हानियों के बाद सुहुङमुङ के अहोमों ने नदी पर उसे हराया, मार डाला और उसकी सेना को घाटी से बाहर कर दिया।

तिथि: 1533 ई.स्थान: ब्रह्मपुत्र पर, कलियाबर–भराली क्षेत्र, असमप्रकार: नौसैनिक
चित्र: Gbaadkar · CC BY-SA 3.0
परिणाम

अहोम नौसेना और सेना ने आक्रमणकारियों को तोड़ दिया; तुरबक मारा गया और उसकी सेना करतोया तक खदेड़ी गई।

01तुरबक का आक्रमण

दिहिंगिया राजा के नाम से याद किए जाने वाले सुहुङमुङ ने 1497 से 1539 तक अहोम राज्य पर राज किया और ब्रह्मपुत्र के साथ उसकी सीमा पश्चिम तक बढ़ाई। 1532 में बंगाल सल्तनत की सेना तुरबक के नेतृत्व में घुड़सवारों, पैदलों और युद्ध-नौकाओं के साथ नदी के रास्ते चढ़ आई। अहोम दरबार के इतिहास-ग्रंथ, बुरंजियाँ, कड़ी लड़ाई और वास्तविक हानियाँ दर्ज करती हैं: सिंगिरी में अहोम हारे और सेनापति फ्रासेंगमुङ बड़गोहाईं मारे गए। असमिया परंपरा उनकी पत्नी मूला गाभरु को याद करती है, जिन्होंने पति के बाद शस्त्र उठाए और लड़ते हुए वीरगति पाई। अहोम पीछे हटे, अपना बेड़ा फिर से खड़ा किया और आक्रमणकारी के और ऊपर आने की प्रतीक्षा की।

02नदी पर युद्ध

1533 में दुइमुनिशिला पर अहोम नौकाएँ बंगाल के बेड़े से भिड़ीं और विजयी हुईं। बुरंजियाँ अभियान की अंतिम लड़ाई भराली के पास बताती हैं, जहाँ तुरबक मारा गया और ताज़ा सेना लेकर आया हुसैन ख़ाँ भी। अहोमों ने टूटी हुई सेना का पीछा घाटी में नीचे करतोया तक किया, जो प्राचीन कामरूप की पश्चिमी सीमा थी। पकड़ी गई तोपें और लोग साथ लाए गए, और बुरंजियाँ लिखती हैं कि इसी समय से अहोम आग्नेयास्त्रों का प्रयोग करने लगे। दुइमुनिशिला का ठीक स्थान और अंतिम लड़ाइयों का क्रम अलग-अलग बुरंजियों में थोड़ा भिन्न है।

महत्त्व

तुरबक की पराजय से असम पर बंगाल सल्तनत के प्रयास समाप्त हुए, और नदी पर युद्ध लड़ने की वह अहोम रीति शुरू हुई जो मुग़लों के विरुद्ध डेढ़ सौ वर्ष चली।